सरहद के उस पार





सरहद के उस पार घर था मेरा,

मिल जुल के रहते थे सब

हम सब का एक ही था डेरा।

आंधी इक ऐसी आयी, 

अपनो  से अपने अलग हुए,

तूफान इक ऐसा, घर से बेघर हुए।

हलचल ऐसी मची, ना रहा 

अपना इक भी रेन बसेरा,

रातों रात, सब कुछ यूं बदला,

हर तरफ थे आग के दरिया और 

आंखों में सिर्फ बदले का धुआं।

इंसान ने ऐसी की तबाही,

दूरियां बढ़ गई;

मिट गई कागजों से प्यार और 

खुशियों की सिहाही।

रहे तो सिर्फ, कागज के कुछ टुकड़े , 

और कुछ तन्हा लम्हों का अंधेरा,

सरहद के पार कभी एक घर था मेरा..

#SrKmusings# 

#onewholesomeworld#

#LetsGrowTogether#

#noboundaries#

#OneWorldOneFamily

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